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देहात प्रेम- 1 (A love story in village)

                                                                         


माँ की 4 मिसकॉल होने के बाद जब प्रतीक ने फ़ोन उठाया, माँ चिल्लाते हुए बोली– "इतनी देर तक कोन सोता है, अकेले बाहर रहते हो तो ऐसे रहोगे।" प्रतीक ने माँ की डांट से बचते हुए कहा- “अरे वो रात को थोड़ा पढ़ते पढ़ते थोड़ी देर हो गयी थी, वैसे फोन क्यों किया इतनी सुबह सुबह अपने कोई काम है?”


"हाँ वो छुट्टी हो गयी है ना तेरी कोचिंग की तो गांव चले जाओ बड़े पापा बुला रहे है, वैसे भी दादा जी जब से स्वर्गवासी हो गए है, तुम गाँव नही गए हो।" मम्मी ने आर्डर देते हुए कहा।

प्रतीक ना ना करते रह गया, लेकिन माँ के आगे किसकी चलती, जल्दी जल्दी तैयार हो कर अपनी स्कूटी लेकर गाँव निकल गया, जाते जाते अपने भाई कम दोस्त को फ़ोन करके बता दिया में आ रहा हूँ।
3 घण्टे के बाद गाँव के अंदर जाने वाली सड़क के पास जा कर प्रतीक ने जैसे ही गाड़ी मोड़ी एक लड़की तेज़ रफ्तार में स्कूटी ला कर एकदम से कट मार के निकली, ठंड होने की वजह से प्रतीक से स्कूटी नही सम्भाल पायी ओर वही ब्रेक लगा कर चिल्लाया- “अरे देख कर नही चला सकती हो?” 

लड़की ने बिना रुके पलट कर देख कर नाक सिकोड़ कर मुस्कराहट हुई बोली- “सॉरी।”
उसकी मुस्कराहट देखते ही प्रतीक उसे देखता ही रह गया।

पास में ही प्रतीक के परिवार की आम की बगिया थी। जनवरी की कड़कती ठंड स्कूटी पर प्रतीक की कुल्फी जम चुकी थी। प्रतीक की आवाज सुन कर एक दो लोग आ गये।
उनमे से एक बोला-“ अरे छोटे प्रधान जी आप इतने दिनों बाद कैसे?”

अरे हाँ प्रतीक के पापा गांव के पूर्व प्रधान थे, इसलिए उसे सब यहाँ छोटे प्रधान जी बुलाते है। पास में जलती आग से प्रतीक ने ओर बाकी सबने हाथ गर्म किये ओर गाँव की तरफ अंदर चल दिये।


प्रतीक जल्दी से घर पहुँच कर बड़ी मम्मी ओर छोटी बहन से मिला, बड़े पापा तो खेत पर थे तो चूल्हे की गर्म गर्म रोटी खा कर आज प्रतीक को दिन में नींद आ गयी। लेकिन प्रतीक की आंखों में तो बस उसी लड़की  का चेहरा था जल्दी नींद खुल गयी।
बड़े पापा घर आ गए थे तो उनसे बाते करके प्रतीक अपने भाई कम दोस्त प्रशांत के घर गया उसको वो एक्सीडेंट वाली सारी बात बता कर पूछा- “बता न कोन है वो?”

 
प्रशान्त मुस्कराते हुए बोला- "निशी नाम है ओर कोई फायदा नही बगल वाले गाँव के लड़के तक पागल है उस पर लेकिन वो किसी को भाव नही देती  है।”
"चल चल तू, में हूँ ना मुझे भाव मिल जयेगा तू मुझे एक बार मिलवा दे बस।” प्रतीक सीना तानते हुए बोला।
प्रशांत हस्ते हुए बोला-“ तू कहा गाँव की लडकी के चक्कर में पड़ रहा है।”
प्रतीक उसके ऊपर चढ़ते हुए बोला-“ जितना बोला उतना कर।”


प्रशान्त ने प्रतीक ने उसको एक तरफ पटकते हुए कहा-“ घर दिखा दूँगा बाकी तेरा काम है, चल अब घूमने चलते है, छोटे प्रधान जी सालो बाद आये है।”
दोनों गाँव की गलियों से चक्कर लगाते हुए जाने।
एक तरफ से आवज आयी- "छोटे प्रधान जी राम राम।"
प्रतीक उनको राम राम बोलते आगे चलता रहा। प्रशान्त एक कुँए के पास रुक कर एक घर की तरफ इशारा करके बताया देख वो तेरी निशी का घर चल अब खेतो पर चलते है। 


दोनों अपने खेतो की तरफ चल दिए तभी सरसों के लहरहते खेत में लड़की दिखी। प्रतीक चिल्लाते हुए बोला- “ओये यही थी।”
प्रशान्त उसके मुँह को बन्द कर अपने खेतो की तरफ पकड़ कर ले गया।
"गधे ऐसे को चिल्लाता है कोई देख लेता अभी पिटवा देता तू।”
प्रतीक पलट कर निशी को देखता रहा।


गुलाबी सूट में हरे खेतो में अपनी सहेली की साथ हँसते हुए निशी दौड़ रह थी ओर प्रतीक बस पलट कर उसे देख रहा था।
                 
                                  ...To be continued...


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